मैं कौन हूं
*मुझे खोज रहे हो ना?* आओ! मैं बताता हूं! कौन हूं मैं? और कहां रहता हूं?* हे! इंसान, पूरी सृष्टि में तू ही ऐसा अकेला जीव है, जिसने मुझे पाने के लिए धर्म जैसी कृत्रिम व्यवस्था को बनाया. तुमने अपने और अपने लोगों के मध्य धार्मिक चिंतन का, धर्म स्थलों का, धर्म ग्रंथों का, धार्मिक संस्थाओं का और धार्मिक कर्मकाण्डो का सारा ठीकरा मेरे सर पर फोड़ दिया! तुम इंसानों ने मुझे पाने के लिए! सम्पूर्ण कार्य धर्म के उपर छोड़ दिया... तुम इंसान इस खूबसूरत धरती के सबसे बुद्धिमान प्राणी हो! तुम लोगों ने अपनी सारी ऊर्जा और क्षमता का बहुत बड़ा हिस्सा धर्म के नाम पर समर्पित कर दिया... तुम लोगों ने समर्पण के नाम पर धर्म जैसी प्रणाली को दिमागी क्षेत्र की कर्मशाला बना दिया... मुझे खोजने के लिए सभी धर्म के ठेकेदारों ने *स्वतंत्र वजूद* वाली सत्ता का रूप दे दिया, जो लगातार कई पीढ़ियों से धीरे-धीरे और भी मजबूत होता चला गया. जिन शुरुआती लोगों ने मुझे तलाशने के लिए, जो कार्य धर्म को सौंपा था, वो कार्य धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता गया... धर्म के ठेकेदारों ने धर्म का पृथक् अस्तित्व बनाए रखने के लिए, एक नया ढांचा तैयार कर लि...