मैं कौन हूं

*मुझे खोज रहे हो ना?* आओ! मैं बताता हूं! कौन हूं मैं? और कहां रहता हूं?*

हे! इंसान, पूरी सृष्टि में तू ही ऐसा अकेला जीव है, जिसने मुझे पाने के लिए धर्म जैसी कृत्रिम व्यवस्था को बनाया. तुमने अपने और अपने लोगों के मध्य धार्मिक चिंतन का, धर्म स्थलों का, धर्म ग्रंथों का, धार्मिक संस्थाओं का और धार्मिक कर्मकाण्डो का सारा ठीकरा मेरे सर पर फोड़ दिया!
तुम इंसानों ने मुझे पाने के लिए! सम्पूर्ण कार्य धर्म के उपर छोड़ दिया... तुम इंसान इस खूबसूरत धरती के सबसे बुद्धिमान प्राणी हो! तुम लोगों ने अपनी सारी ऊर्जा और क्षमता का बहुत बड़ा हिस्सा धर्म के नाम पर समर्पित कर दिया... तुम लोगों ने समर्पण के नाम पर धर्म जैसी प्रणाली को दिमागी क्षेत्र की कर्मशाला बना दिया...
मुझे खोजने के लिए सभी धर्म के ठेकेदारों ने *स्वतंत्र वजूद* वाली सत्ता का रूप दे दिया, जो लगातार कई पीढ़ियों से धीरे-धीरे और भी मजबूत होता चला गया. जिन शुरुआती लोगों ने मुझे तलाशने के लिए, जो कार्य धर्म को सौंपा था, वो कार्य धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता गया... धर्म के ठेकेदारों ने धर्म का पृथक् अस्तित्व बनाए रखने के लिए, एक नया ढांचा तैयार कर लिया, ताकि धर्म नाम के कार्यक्रम भविष्य में चलता रहे और उससे जुड़े लोग अपने वजूद को कायम रख सकें...
क्या रूप है मेरा? किसी को कुछ भी पता नहीं! मेरा कोई आकार है या मैं निराकार हूं? मैं कल भी था... मैं आज भी हूं... और अनंत काल तक रहूंगा भी... धीरे-धीरे धर्म के नाम पर, नई परम्परा ने भोले-भाले इंसानों को मेरी सहज अनुभूतियों से दूर करना शुरू कर दिया! कालांतर में इन धर्मों ने, मुझे पाने के लिए बहुत सारे चमत्कार और रहस्यों के साथ मुझे जोड़ दिया, ताकि मैं भोले-भाले इंसानों के लिए एक अबूझ पहेली बना रहा हूं...?
सभी धर्मों के ठेकेदारों ने मुझे पाने के लिए बहुत ही जटिल प्रक्रिया का रूप दे दिया, ताकि इस चमत्कारी और रहस्यमय जटिलता में उलझ कर एक भोला इंसान मेरे अस्तित्व से अनजान बना रहे...! जबकि मैं हर पल, हर प्राणी, हर जीव और हर इंसानों के पास रहता हूं! निद्रा की अवस्था में सपनों को *आकार* मैं ही देता हूं! दिन के उजाले में सोच का आकार मैं ही देता हूं! 
अच्छे बुरे कर्मों के आधार पर भविष्य की योजना मैं ही तैयार करता हूं! इस ब्रह्मांड में इंसानों के वजूद से पहले भी मैं था! तब भी मेरे साथ असंख्य जीव पदार्थ मौजूद थे. तब से लेकर आज तक किसी भी जड़ चेतन प्राणी ने मेरी खोज में! अपनी ताकत और अपनी ऊर्जा खर्च नहीं की...
उन असंख्य जीव पदार्थों ने मेरी पूजा, उपासना और आराधना के लिए कोई धर्म नहीं बनाया और ना ही मेरे किसी धर्म स्थल को बनवाया. उन्होंने मुझे मनाने के लिए, खुश करने के लिए या पाने के लिए कोई भी धार्मिक आख्यान, बली प्रथा,  कोई भी धार्मिक ग्रंथ तैयार नहीं करवाया... उन जीव पदार्थों ने मुझे आधार बनाकर कोई भी नियम कायदे नहीं बनाए... उन्होंने खुद अपने आप को मेरा प्रतिनिधि या कोई दिव्य पुरुष घोषित नहीं किया?
ना ही मेरे प्रति किसी भी प्रकार का लालच या डर पैदा किया...! कालांतर में जिन महापुरुषों ने मुझे अपनी सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा पहचानने की क्षणिक कोशिश की और पूरा जीवन समर्पित कर दिया. किंतु तुम इंसानों ने उन महापुरुषों की पूजा, अराधना शुरू कर दी. उन महापुरुषों के बताए हुए रास्ते पर न चलकर उनका मूर्त रूप देकर अपने-अपने धर्म स्थलों पर स्थापित कर दिया. 
किन्तु सहज और सरल हृदय वाले जीव पदार्थों ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने स्वाभाविक तौर पर मेरी उपस्थिति को महसूस किया. मुझे अपना अभिन्न हिस्सा माना. मैं कल भी था... आज भी हूं... कल भी रहूंगा...  हे! इंसान, तुम इस‌ लेख को पढ़ रहे हो, तब भी मैं तुम्हारे भावों में, तुम्हारे विचारों में तुम्हें सद्बुद्धि देने का प्रयत्न कर रहा हूं! अब भी वक्त है मुझे पहचानने में गलती मत कर...
तुम्हारा विचार, तुम्हारा दृष्टिकोण! इस बात पर निर्भर करता है कि तुम इस वक्त क्या सोच रहे हो? तुम इंसान भी मुझे सहज भाव से मेरी उपस्थिति को अनुभव कर सकते हो! यह तभी संभव होगा जब तुम मन से किसी के प्रति बुरे विचार न रखो, वचन से किसी को बुरा ना कहो, कर्मो से किसी का अहित ना करो... शून्य विचारों के साथ एकांत में मुझे आत्मसात करो...!
मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं. 
करोड़ों वर्षों से मैं हर पल, हर जीव प्राणी के साथ सदैव से रहा हूं और सदैव ही रहूंगा. किसी धार्मिक चिंतन, दर्शन और किसी धर्म के बिना इन जीव पदार्थों ने करोड़ों वर्ष का जीवन चक्र पूरा किया है और कर रहे हैं... पर इंसानों ने अपने धर्म और धार्मिक संस्थाओं में रहते हुए कुछ हजार सालों में अपने आप को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है. मुझे सहज भाव से पाने वाले जीव पदार्थ कल भी थे आज भी है और तुम इंसानों के ना रहने के बाद भी इस जीवन चक्र का हिस्सा बने रहेंगे...!  
धीरे-धीरे मुझे जानने की जिज्ञासा ने तुम इंसानों ने अपनों के बीच धर्म के बीज बो दिए. धर्म के इन ठेकेदारों ने इंसानों की गतिविधियों को व्यवस्थित और नियंत्रित करने की जरूरत को एक आकार दे दिया... इन धार्मिक चिंतन को तुम इंसानों की आस्था और विश्वास का खाद पानी मिलते ही धर्म एक विशाल दिमागी कर्मशाला में बदल गया...! धर्म के इन ठेकेदारों ने इंसान के लालच और डर को एक काल्पनिक विस्तार दे दिया! 
धर्म के ठेकेदारों ने धर्म नाम के *"अस्तित्व"* को बचाने के लिए इंसानों की भावनाओं का दोहन शुरू कर दिया. प्रत्येक धर्म ने नई *"चेतना, उदारता और अधिकार को"* अपनी बपौती समझ कर, इंसानों की वैचारिक जमीन पर अंकुरित और फलने फूलने दिया... धीरे-धीरे धर्म के इन ठेकेदारों ने, धर्म के नाम पर अंधविश्वास, कट्टरता, पाखंड, पूर्वाग्रह और पागलपन की शाखाओं को पनपने का मौका दिया. 
शाखाएं जितनी लंबी होती गईं उतना ही इंसानों की वैचारिक धरातल को जकड़ कर वैकल्पिक जड़ों का रूप देती चली गई! और "सच्चे धर्म की मूल जड़़ को नष्ट करती चली गई...* धर्म के इन ठेकेदारों ने तुम इंसानों को तमाम प्रकार की रहस्यमय, चमत्कारों, कर्मकांडो और मतभेदों के जाल में फंसा दिया. धर्म के इन ठेकेदारों ने मुझे भी मूर्त रूप देकर धार्मिक स्थलों में मेरी मान्यताओं को कैद कर दिया. तुम इंसानों का मानसिक दोहन कर के मेरे होने का निरर्थक प्रयास करते रहे हैं. 
मेरा आकार है या मैं निराकार हूं अपनी व्यापकता, सूक्ष्म और सहज भाव से मैं उनकी कैद से बाहर रहता हूं. शुरुआती दौर में अपने शैशवकाल में सादगी और संयम पर जोर देनेवाले सभी धर्म अपने विस्तार और विकास के साथ-साथ भोले भाले इंसानों को आधिपत्य और अपनी वर्चस्व की लड़ाई में झोंक देते हैं. इस लड़ाई में धर्म के नाम पर मुझे अलग-अलग नामों से, अलग-अलग रूपों के आधार पर जायज ठहराते हैं. यह नाम और रूप धर्म के ठेकेदारों द्वारा आदिकाल से विभिन्न धर्मों की आधारशिला बनी हुई है...

....लालधर

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